<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172</id><updated>2012-01-26T12:54:57.704-08:00</updated><title type='text'>मनोदशा</title><subtitle type='html'>आपके मन की हालत को, न कोई देख सकता है, न ही सुन सकता है, हाँ, इसे पढ़ा जा सकता है, ग़र कागज़ी हो जाए आपकी मनोदशा...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>12</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-6870138080868063835</id><published>2010-06-16T06:45:00.000-07:00</published><updated>2010-06-16T06:46:38.088-07:00</updated><title type='text'>ईसुरी की एक और फाग</title><content type='html'>ईसुरी की एक और फाग:- &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चलतीं कर खालें खों मुइयां,&lt;br /&gt;रजऊ बैस लरकइयां,&lt;br /&gt;हेरत जात उंगरियन में हो, तकती हो परछइयां,&lt;br /&gt;लचकें तीन परें करिहा में, फरके डेरी बइयां,&lt;br /&gt;हर तन मुख झरें पतर फूल से, जे बागन में नइयां,&lt;br /&gt;धन्न भाग वे सइयां ईसुर, जिनकी आएं मुनइयां... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(तुम नीचे को मुंह करके चलती हो। अभी लड़कपन है तुम्हारा। घंूघट की कोर पर उंगली लगाकर किसे देखती हो या अपनी परछाई ही ताकती हो? तुम्हारी कोमल कमर में तीन- तीन लचक पड़ती हैं और हमारी डेरी (बायें) बांह फड़कती है। हंसती हो तो ऐसे, जैसे फूल खिलते हैं, जो हमने कभी बागों में नहीं देखे। अरे ईसुरी, उन सइयां (पति या प्रेमी) के धन्य भाग्य हैं, जिनकी तुम प्रेमिका या पत्नी हो।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-6870138080868063835?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/6870138080868063835/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/6870138080868063835'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/6870138080868063835'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='ईसुरी की एक और फाग'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-7437882744584196732</id><published>2010-02-24T05:52:00.000-08:00</published><updated>2010-02-24T05:53:42.093-08:00</updated><title type='text'>novel</title><content type='html'>एक उपन्यास शुरू किया है। कुछ अंश डाल रहा हूं। आपकी प्रतिक्रियाएं चाहता हूं। धन्यवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम का वक्त था। राजू और मैं उसकी की दुकान के बाहर बैठे बातें कर रहे थे। तभी सामने सड़क पर देखा कि एक लड़की किसी औरत के साथ आ रही है। हल्का से अंधेरा होने लगा था, इसलिए साफ नजर नहीं आ रहा था। हमारी नजर जब उस लड़की पर पड़ी, तो राजू बोला-&lt;br /&gt;‘यार देख, क्या माल आ रहा है।’&lt;br /&gt;‘हां यार, शक्ल नहीं दिख रही है, लेकिन उसने जो सुंदर सा सूट पहना है, उससे तो लगता है कि बहुत माल है।’ मैंने आंखें फाड़ते हुए कहा।&lt;br /&gt;‘अगर सुंदर हुई, तो मेरी और नहीं हुई, तो तेरी...’&lt;br /&gt;‘अच्छा बेटा, अंगूर खट्टे हुए, तो खाएगा नहीं। खैर, मुझे खराब भी चलेगी। अपने मोहल्ले की होगी क्या?’&lt;br /&gt;‘पता नहीं यार, पास आए, तो पता चले’&lt;br /&gt;वह धीरे- धीरे करीब आ रही थी और हम दिल थामे और पास आने का इंतजार कर रहे थे। दोनों के दिमाग में एक ही बात चल रही थी, काश लड़की सुंदर हो। थोड़ी देर में लड़की पास ही आई और राजू के सामने खड़े होकर बोली-&lt;br /&gt;‘नमस्ते भइया’&lt;br /&gt;राजू ने नमस्ते तो किया, लेकिन काटो तो खून नहीं। उसका चेहरा फक पड़ गया। शर्म के मारे वह कविता से आंखें नहीं मिला पा रहा था। जाहिर है, मुझे भी थोड़ी सी शर्म तो आई ही होगी। नमस्ते करने के बाद कविता घर के अंदर चली गई। राजू ने घूरकर मेरी तरफ देखा, तो मैंने मुंह दूसरी तरफ कर लिया। उसने मेरी सिर में एक चमाट लगाई और कहा-&lt;br /&gt;‘साले, क्या- क्या निकलवा दिया मेरे मुंह से। वो मेरी मौसी की लड़की है कविता। तेरी वजह...’&lt;br /&gt;‘मैंने बात शुरू की थी?’ मेरे और राजू दोनों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। हम दोनों ही एक- दूसरे से आंखें मिलाने में कतरा रहे थे। मैं उठकर अपने घर चल दिया। घर जाते वक्त रास्ते में यही सोच रहा था कि मेरी भी एक बहन है। क्या बाकी लड़के भी मेरी बहन के बारे में ऐसा ही सोचते होंगे। वे भी तो हमारी बहनों को देखकर माल और न जाने क्या- क्या कहते होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-7437882744584196732?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/7437882744584196732/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2010/02/novel.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/7437882744584196732'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/7437882744584196732'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2010/02/novel.html' title='novel'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-3527862814111884319</id><published>2009-10-06T05:35:00.001-07:00</published><updated>2009-10-06T05:35:55.930-07:00</updated><title type='text'>उस दौर में भी निजी संपत्ति थीं महिलाएं!</title><content type='html'>कुछ दिनों पहले मैंने महाभारत सीरियल देखा। प्रसंग था द्रोपदी चीरहरण। हालांकि महाभारत तो मैं अपने बचपन के दिनों में भी देख चुका हूं, लेकिन उस दिन कुछ गौर करके देखा। दरअसल, दो महीने पहले मेरा एक्सिडेंट हो गया था और पैर टूटने की वजह से मैं घर पर ही था। खैर, उस दिन महाभारत में वह प्रसंग देखकर मुझे महसूस हुआ कि सिर्फ आज के वक्त में ही नहीं, बल्कि उस युग में भी औरतों को निजी संपत्ति समझा जाता था। उस वक्त भी लोग यही सोचते थे कि औरत से शादी कर ली, तो उसका कैसे भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में द्रोपदी का क्या हुआ होगा, जबकि उनके तो पांच- पांच पति थे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामा शकुनी पांसे फेंक रहे थे और कौरव पौ-बारह जैसे अंक लाने की मांग कर रहे थे। सामने पांडव अपनी लाचारी लिए बैठे थे। जहां से मैंने महाभारत देखना शुरू किया, वहां तक पांडव अपनी सारी संपत्ति हार चुके थे। अब उनके पास एक ही संपत्ति थी द्रोपदी। दुर्योधन ने जब 'धर्मराज' युधिष्ठिर से पांचाली को दांव पर लगाने को कहा, तो भीम का खून खौल गया, अर्जुन को भी गुस्सा आया, लेकिन किसी का इतना साहस नहीं हुआ कि पांच में से एक भी भाई द्रोपदी को दांव पर लगाने का विरोध करता। आखिरकार, पांसे फिर फेंके गए, परिणामस्वरूप पांडव यह दांव भी हार गए। दुर्योधन के कहने पर पांचाली को भरे दरबार में अपमानित तरीके से लाया गया। दुस्साशन ने पूरे दुस्साहस के साथ द्रोपदी को निर्वस्त्र करने का प्रायस किया। फिर जैसा कि तय था कृष्ण ने आकर द्रोपदी की मदद की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां यह साफ हो गया है कि औरत को निजी संपत्ति समझकर दांव पर लगाया गया। एक बार उसकी मर्जी भी नहीं पूछी गई कि आखिर वह क्या चाहती है। खैर, यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। जैसा की सीरियल में आगे दिखाया गया कि चौपर का खेल खत्म होने के बाद जब द्रोपदी पांडवों के साथ वनगमन की तैयारी कर रही थीं। उस वक्त उन्होंने धर्मराज से कहा कि आप मुझे वचन दीजिए कि अब कभी भी, किसी भी खेल में मुझे दांव पर नहीं लगाएंगे। इस पर नकुल का कहना था कि पांचाली आप ऐसा कहकर भइया का अपमान कर रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी द्रोपदी ने खुद को आगे से अपमानित न करने का वचन लेकर धर्मराज का अपमान कर दिया और भरी सभा में जब द्रोपदी का अपमान किया जा रहा था, तब नकुल खामोश होकर देखते रहे। वाह रे पुरुष प्रधान समाज! अगर द्रोपदी ने ऐसा वचन लिया तो क्या गुनाह कर दिया। सबसे पहले तो यह कि आखिर क्या मजबूरी थी कि पांडवों को चौपर खेलना पड़ा? क्या मजबूरी थी कि उन्होंने द्रोपदी को दांव पर लगाया? क्या कौरवों ने उनके गले पर तलवार रखकर खिलवाया था या फिर द्रोपदी को दांव पर लगाने के लिए भी धनुष वाण उठाए थे? अगर युगों युगों से औरतों का सम्मान किया गया होता या फिर उन्हें बराबरी का दर्जा दिया गया होता, तो शायद आज भी हम औरतों को वास्तव में देवियों की तरह पूज रहे होते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-3527862814111884319?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/3527862814111884319/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/10/blog-post_06.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/3527862814111884319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/3527862814111884319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/10/blog-post_06.html' title='उस दौर में भी निजी संपत्ति थीं महिलाएं!'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-8087381325651703006</id><published>2009-10-04T09:34:00.000-07:00</published><updated>2009-10-04T09:36:39.009-07:00</updated><title type='text'>क्यों ठंडा पड़ गया हमारा जोश?</title><content type='html'>दोस्तों, याद है या फिर भूल गए। मैं बात कर रहा हूं उस तारीख की, जो कभी न भूलने वाली है, लेकिन लगता है मुम्बई की व्यस्त जिंदगी में हमारे युवा बंधु उस काली तारीख को भूल चुके हैं। मैं बात कर रहा हूं 26 नवम्बर 2008 की, जिसने सैकड़ों जानें लील ली थीं। मुझे तो यही लगता है कि हम वह तारीख भूल गए हैं, क्योंकि आतंकी हमले के ठीक बाद लोकसभा चुनाव थे और हमने कितना विरोश किया था। जोश-ओ-खरोस के साथ सरकार बदलने की शपथ ली थी। 'अब बहुत हो गया और नहीं सह सकते' यह भी कहा था, लेकिन अब वह जोश ठंडा पड़ गया लगता है। दिलों की आग बुझ गई लगती है। वरना, वही जोश, वही जुनून महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिलता। जबकि 26 नवम्बर का वह मनहूस दिन महाराष्ट्र के ही महानगर मुम्बई के इतिहास में लिखा गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या वजह है कि हम उस घटना को भूल गए हैं? मुझे लगता है कि हमारे दिलों में जो आग जली थी, वह हमारी मर्जी से नहीं, बल्कि बाहरी ताकतों ने लगाई थी। जैसे- एनजीओ ने, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने से मतलब है। या उन फिल्मी हस्तियों ने, जिन्हें मीडिया में खुद को दिखाने की चाहत है। या फिर उन नेताओं ने, जो अपनी पार्टी की जगह लोगों के दिलों में बनाना चाहते थे कि यही पार्टी देश का उद्धार कर सकती है, यही पार्टी आतंक के खिलाफ लड़ सकती है। या फिर इसलिए भूल गए हैं कि मरने वालों में कोई अपना नहीं था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा याद करो, जब आतंकी गोलियां बरसा रहे थे और हम लाचार थे और सरकार नकारा। सिर्फ हमारे कमांडो ही थे, जो दुश्मनों का जी-जान से मुकाबला कर रहे थे। कुछ नहीं तो महाराष्ट्र के लोगों को उन जवानों को तो याद रखना ही चाहिए, जिनकी पत्नियां विधवा हो गईं और बच्चे बिना बाप के। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां गए वे रेडियो स्टेशन, कहां गए वे टीवी चैनल और कहां गए वे अखबार, जो चिल्ला- चिल्लाकर कहते थे, अबके आंखों के आंसू सूखने चाहिए। कहां गए वे लोग, जो हाथों में मोमबत्तियां लिए गेटवे ऑफ इंडिया के सामने खड़े होकर मृतकों की आत्मा की शांति के लिए दुआएं मांग रहे थे। कहां गए वे लोग, जो हाथों और माथों पर काली पट्टियां बांधकर पड़ोसी मुल्क को इस हादसे लिए जिम्मेदार ठहराकर गालियां देते थे। क्या हम सब भी जिम्मेदार नहीं हैं ऐसे हादसों के लिए, जो भावनाओं के बहाव में कुछ देर के लिए तो बह जाते हैं, लेकिन जहां कश्ती दिखाई देती है, वहीं ठहर जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम उन सियासतदानों को भी भूल गए हैं, जो राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए दूसरे राज्यों चंद घडिय़ाली आंसू बहाकर चले गए। उन फिल्मकारों को भी भूल गए हैं, जो राजनीतिज्ञों के बेटों के साथ जाकर होटल ताज का जायजा लेने गए। इसलिए नहीं कि वहां बिखरे खून को पोंछ सकें, बल्कि इसलिए कि एक फिल्म की कहानी मिल जाएगी। क्या इस बार भी हम सब मिलकर एक स्वर में नहीं कह सकते, 'जागो, उठो और उसे चुनो जो लायक हो...!' या फिर 26 नवम्बर का इंतजार करेंगे होटल ताज, सीएसटी और ट्राइडेंट होटल के सामने मोमबत्तियां जलाने के लिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-8087381325651703006?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/8087381325651703006/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/8087381325651703006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/8087381325651703006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='क्यों ठंडा पड़ गया हमारा जोश?'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-1262143421660224018</id><published>2009-09-29T07:36:00.000-07:00</published><updated>2009-09-29T07:46:23.725-07:00</updated><title type='text'>मैं राम-कृष्ण को नहीं मानता</title><content type='html'>आज हम इंसानों से अंजाने में भी कोई गलती हो जाती है, तो भी उसे सजा सुनाई जाती है। मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं, जो जानकर अपराध करते हैं। ऐसे लोगों को तो सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन एक बार मेरी तरह सोचकर देखिए कि क्या भगवान के युग से अपराध नहीं हुए हैं। यहां तक कि भगवान ने कई अपराध किए हैं (मेरी नजर में)। लेकिन उन्हें तो किसी ने सजा नहीं दी, बल्कि पूजा ही की जाती है। मैं नास्तिक नहीं हूं। कभी- कभी पूजा भी कर लेता हूं। मां दुर्गा पर मेरी असीम आस्था है। लेकिन पता नहीं क्यूं राम और कृष्ण की कुछ बातें मुझे खटकती हैं। मेरा मन उन्हें मानने का नहीं करता। इस लेख को लिखकर मेरा उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है और न ही राम और कृष्ण में विश्वास कम करने का है। मैं समझता हूं, जिनकी राम और कृष्ण में श्रद्धा है, वह अटूट रहे। मैं यहां सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज छल-कपट का मायाजाल चारों ओर फैला हुआ है। लेकिन क्या राम ने छल नहीं किया या फिर कृष्ण इससे अछूते रहे। कृष्ण का तो एक नाम ही छलिया था। मुझे ऐसा लगता है कि कृष्ण ने सिर्फ अपनी सत्ता मनवाने के लिए महाभारत जैसा दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध करवाया था। इसे नाम दिया धर्म युद्ध। जबकि मेरी नजर में कदम- कदम पर यह युद्ध छल और अधर्म की विसात पर लड़ा गया। फिर चाहे वह कर्ण का वध हो या फिर दुर्योधन का। इन सभी में छल ही तो था। कृष्ण ने छल से कर्ण के कवच और कुंडल उनकी मां से उतरवा लिए, जबकि दुर्योधन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। जब गांधारी ने दुर्योधन से कहा कि वे निर्वस्त्र उनके सामने आएं, तो कृष्ण ही थे, जिन्होंने दुर्योधन से कहा था कि तुम्हें शर्म नहीं आती, मां के सामने बिना कपड़ों के जाओगे। कम से कम कमर में तो कुछ पहन लो। और फिर दुर्योधन ने कमर में केले का पत्ता लपेट लिया था। गांधारी की नजर पड़ते ही दुर्योधन का पूरा शरीर तो लोहे का हो गया, जबकि कमर नहीं हो सकी।&lt;br /&gt;कृष्ण ने इसका फायदा भीम और दुर्योधन के बीच हुए गदा युद्ध में उठाया। जब भीम किसी भी तरह दुर्योधन को पराजित नहीं कर सके, तो कृष्ण ने ही उन्हें इशारा करके बताया था कि कमर के नीचे वार करो। भीम ने वैसा ही किया और दुर्योधन की मौत हो गई। उस वक्त दुर्योधन और भीम के गुरु और कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ ने क्रोधित होकर कहा था कि कृष्ण तुमने यह ठीक नहीं किया। कृष्ण ने भीम और अपने बचाव में कई तर्क दिए, पर बलदाऊ का यही कहना था कि गदा युद्ध का नियम होता है, कमर से नीचे वार नहीं करना। भीम ने इस नियम का उल्लंघन किया है। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें भीम के शिष्य होने पर शर्म आती है, जबकि दुर्योधन पर वे गर्व महसूस करते हैं। मैं भी बलदाऊ की बातों से सहमत हूं। हालांकि कृष्ण ने कई जगहों पर छल का सहारा लिया, लेकिन यह कुछ बड़े उदाहरण हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब राम की बात करें तो बाली वध में उन्होंने भी छल से ही काम लिया। किसी को भी छिपकर मारना राम जैसे मर्यादापुरुषोत्तम को शोभा नहीं देता। इस बात पर कई बार मेरी कई लोगों से बहस हुई, लेकिन आज तक मुझे किसी ने उचित तर्क नहीं दिया। खैर, बाली को मारने के बाद उन्होंने मारने की वजह बताई थी कि उसने अपनी बहू को कैद किया था इसलिए उन्होंने वध किया। जबकि मैं कहता हूं कि राम के नाम से तो सभी परिचित थे। फिर उन्होंने क्यों एक बार बाली को जाकर समझाया कि तुम सुग्रीव की पत्नी को छोड़ दो? क्या बाली भगवान की बात नहीं मानता? हो सकता है कि मुझे उचित तर्क नहीं मिले हैं, इसलिए मैं राम से थोड़ा खफा हूं। अगर कोई भी राम और कृष्ण को लेकर मेरे कुछ सवालों को सही उत्तर देता है, तो शायद में उन पर विश्वास करने लगूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(औरतों के सम्मान को लेकर भी मेरे मन में कुछ प्रश्न हैं, जिन्हें जल्द पेश करूंगा।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-1262143421660224018?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/1262143421660224018/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/09/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/1262143421660224018'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/1262143421660224018'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='मैं राम-कृष्ण को नहीं मानता'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-6333556569624595636</id><published>2009-07-17T08:01:00.000-07:00</published><updated>2009-07-17T08:03:54.968-07:00</updated><title type='text'>मूर्ख नहीं फ्रस्ट्रेटेड हैं</title><content type='html'>एक ऐक्टर, जिसके पास इन दिनों कोई काम नहीं है। एक चैनल, जिसने आज तक लोगों को सिर्फ बेशर्मी ही परोसी है। फिर चाहे वो एकता कपूर के सीरियल के रूप में हो या फिर 'सच का सामना' में। बात भारतीय या विदेशी समाज की नहीं है। बात रिश्तों की है, जो कितनी मुश्किलों में जुड़ते हैं और उन्हें निभाने में कितनी परेशानियां आती हैं। लेकिन बाजारवाद की पट्टी बांधे इन धृतराष्ट्रों को कौन समझाए? माना कि उनकी आंखों पर पैसे की पट्टी बंधी है, लेकिन हमारी आंखें तो खुली हैं। क्यों हम ऐसे धारावाहिकों को नकारते नहीं? क्यों हम इनका विरोध नहीं करते? शायद, इसलिए कि वहां हमारा कोई नहीं बैठा होता है। सोचिए, अगर जवाब देने वाली महिला या पुरुष आपकी मां या फिर पिता हो, बीवी या बहन हो, तो आपके मन पर क्या असर होगा। इसका जवाब कोई नहीं दे सकता। हमें दूसरों को नंगा देखने का शौक होता है, खुद नंगे नहीं हो सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमाम में सभी नंगे होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम सबके सामने कपड़े उतार दें। अगर सर्वे कराया जाए, तो 99 फीसदी लोगों का यही कहना होगा कि 'सच का सामना' शो बेहद शर्मनाक और भद्दा है। जिनका जवाब सीरियल के पक्ष में होगा, वे या तो विकृत मानसिकता के लोग होंगे या फिर फ्रस्ट्रेटेड। जिन्हें सिर्फ समाज को नंगा करने में ही मजा आता है। उन्हें इसमें गंदगी ही दिखती है। जो मानते हैं वे खुद क्रिएटिव हैं। जबकि सच यह है कि तथाकथित क्रिएटिव लोग फ्रस्ट्रेटेड होते हैं।  हमारी फिल्म इंडस्ट्री और टेलीविजन जगत ने हमेशा हॉलीवुड की ही नकल की है। इस चक्कर में वे यह भी भूल गए हैं कि यहां के दर्शकों और हॉलीवुड के दर्शकों में क्या फर्क है? क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं? कहते हैं कि अगर किसी के भले के लिए झूठ भी बोलना पड़े, तो बोल देना चाहिए। लेकिन 'सच का सामना' में झूठ को भी सच बताने की कोशिश की जाती है, वह भी एक मशीन के दम पर, जिसकी रिपोर्ट कोर्ट भी नहीं मानता। मैं इस सीरियल के खिलाफ हूं, जो समाज को तोडऩे का काम करे। फिल्म और टीवी समाज को जोडऩे के लिए होना चाहिए, तोडऩे के लिए नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-6333556569624595636?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/6333556569624595636/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/07/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/6333556569624595636'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/6333556569624595636'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='मूर्ख नहीं फ्रस्ट्रेटेड हैं'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-1940807250845131750</id><published>2009-06-09T06:24:00.000-07:00</published><updated>2009-06-09T06:30:44.371-07:00</updated><title type='text'>असलियत से हारती उम्मीदें...</title><content type='html'>लोकल की दस्तान बीच में छोड़ते हुए, आप लोगों के सामने एक अलग की कहानी पेश कर रहा हूं। दरअसल, यह कहानी नहीं है, बल्कि सच्चाई है, जो राजस्थान पत्रिका की वेबसाइट से मैंने ली है। पता नहीं क्यूं, यह खबर मेरे दिल को छू गई है। सो आप लोगों तक भी पहुंचा रहा हूं। लेखक का नाम तो पता नहीं है, लेकिन जिसने भी लिखा है, बहुत ही अच्छे और मार्मिक तरीके से लिखा है। लेखक को शुभकामनाएं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिनेमाई परदे की कहानियां अगर सच्चाई में बदल जाए, तो जिंदगी शायद इतनी तकलीफदेह नहीं हो। इस बात को शफीक सैयद से बेहतर शायद ही कोई समझ सकता है। "स्लमडॉग मिलिनेयर" की चकाचौंध में डूबे बहुत कम सिने प्रेमी ऎसे होंगे, जिनकी यादों में शफीक सैयद का नाम बरकरार होगा। शफीक ने मीरा नायर की बेहद चर्चित फिल्म "सलाम बॉम्बे" में कृष्णा (चायपाव) का किरदार निभाया था। लेकिन इस बाल कलाकार की किस्मत उर्मिला मातोंडकर या जुगल हंसराज जैसी नहीं थी। शफीक आज एक गुमनाम-सी जिंदगी जी रहा है। वह मुंबई में ऑटो रिक्शा चलाता है और उसका परिवार, जिसमें बीवी और चार बच्चे हैं, हैदराबाद में उस रकम के सहारे अपने दिन गुजार रहा है, जो हर महीने शफीक उन्हें भेजता है। करीब इक्कीस साल पहले आई फिल्म "सलाम बॉम्बे" के लिए शफीक को सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इसके अलावा फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल किया था। "सलाम बॉम्बे" को ऑस्कर पुरस्कारों के तहत विदेशी भाषा वर्ग में भी नॉमिनेट किया गया और दूसरे कई छोटे-बड़े पुरस्कार भी इस फिल्म ने जीते। मंुबई की झुग्गियों मे रहने वाले शफीक के साथ पच्चीस से ज्यादा बच्चों ने इस फिल्म में अपने ही किरदार को परदे पर उतारा और इस तरह वे फिल्म की कामयाबी का एक जरूरी हिस्सा बने। लेकिन इन बाल कलाकारों का फिल्मी जीवन यहीं तक सीमित रहा। फिल्म में काम करने वाले बच्चों में से तीन अब इस दुनिया में नहीं हैं- एक सड़क हादसे में मारा गया, दूसरा एड्स का शिकार हुआ और तीसरा निमोनिया के कारण मौत के मुंह में चला गया। फिल्म में सलीम का किरदार प्ले करने वाला मोहनराज बाबू फिलहाल मुंबई में कैटरिंग का काम करता है, जबकि कोयला का कैरेक्टर साकार करने वाला सरफुद्दीन कुरैशी आजकल पटना में है। हालांकि मीरा नायर ने झुग्गियों में रहने वाले बच्चों की बेहतरी के लिए सलाम बालक ट्रस्ट कायम किया, लेकिन उनकी फिल्म में काम करने वाले बच्चों के लिए बेहतर जीवन एक सपना ही रहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह जो लोग हाल ही "स्माइल पिंकी" को डॉक्यूमेंट्री वर्ग में ऑस्कर पुरस्कार मिलने से बेहद उत्साहित हैं, वे शायद "बोर्न इंटू ब्रोथल्स" को भूल गए हैं। ब्रिटिश फिल्मकार जाना ब्रिस्की और रॉस कॉफमैन की यह डॉक्यूमेंट्री एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट इलाके यानी कोलकाता के सोनागाछी में रहने वाली तवायफों की जिंदगी पर आधारित है और इसे 2005 में ऑस्कर अवार्ड हासिल हुआ था। लेकिन फिल्म में काम करने वाले तवायफों के बच्चों की जिंदगी आज भी उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां से हर रास्ता उन्हें एक अंधी सुरंग की तरफ ही ले जाता है। सोनागाछी की पूजा मुखर्जी उस समय 16 साल की थी, जब उसने इस डॉक्यूमेंट्री में काम किया था। आज पूजा 20 साल की है और वह भी सोनागाछी के बाजार की उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है, जिसमें जिस्म का सौदा करना किसी लिहाज से गलत नहीं माना जाता। इतना बदलाव जरूर आया है कि पूजा को अपना एक अलग फ्लैट मिल गया है, जिसमें एक छोटा टीवी सैट भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि हर साल वह इस टीवी सैट पर ऑस्कर अवार्ड समारोह का सीधा प्रसारण देखना नहीं भूलती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या यह माना जाए कि हालिया दौर में चौतरफा धूम मचाने वाली फिल्म "स्लमडॉग मिलिनेयर" में काम करने वाले बच्चों के लिए भी कामयाबी मुट्ठी में बंद उस रेत के समान है, जिसका सिर्फ एहसास बाकी है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में काम करने वाले स्लम के बच्चों रूबीना अली और अजहरूद्दीन इस्माइल के फोटो अखबारो के पहले पेज पर छपे हैं, जिनमें वे संभ्रांत वर्ग के आयुष खेड़ेकर और हेमंत छेड़ा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। किसी कोने में वाराणसी के पास मिर्जापुर के छोटे-से एक गांव की पिंकी सोनकर भी है। जाहिर है कि पिंकी, रूबीना और अजहर के लिए फिलहाल जिंदगी किसी परी कथा से कम नहीं है। इन बच्चों को लॉस एंजिल्स के कोडक थिएटर में रेड कार्पेट का वह सम्मान हासिल हुआ है, जिसका ख्वाब सिनेमा से जुड़ा हर शख्स देखता है। लेकिन फिलहाल इन बच्चों को इस सच्चाई का जरा भी एहसास नहीं है कि परियों की कहानियां सिर्फ किताबों में ही मिलती हैं, असल जिंदगी से उनका कोई रिश्ता नहीं होता। "स्लमडॉग मिलिनेयर" में छोटे सलीम का किरदार निभाने वाला दस साल का अजहर फिलहाल अपने पिता मुहम्मद इस्माइल की उम्मीदों का बोझ ढो रहा है। अजहर के पिता को उम्मीद है कि फिल्म के प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की तरफ से उसे और रकम मिलेगी, जिससे वह अपना इलाज करा सकेगा। पर मुहम्मद इस्माइल सिर्फ इस बात पर अपने बेटे को थप्पड़ मारने से भी नहीं चूका कि उसने थकान के कारण मीडिया को और इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया था। उधर, पिंकी सोनकर की मां को उम्मीद है कि बेटी को यह कामयाबी मिलने के बाद अब सरकार उन्हें एक दुकान खोलने लायक रकम तो जरूर मुहैया कराएगी। इस बीच, रूबीना अली कुरैशी की सगी मां भी अचानक सामने आ गई है, जिसने पांच साल पहले रूबीना और उसके दो भाई-बहनों को छोड़कर कहीं और घर बसा लिया था। नफरत अचानक मुहब्बत में बदल गई है और ऎसा लगता है जैसे किसी फिल्मी पटकथा को एक नई जमीन मिल गई है। अजहर बड़ा होकर सलमान खान बनना चाहता है, जबकि रूबीना की आंखों में प्रीति जिंटा की मुस्कराती तस्वीर है। धारावी की गरीबनगर बस्ती में ऎसे कई सपने पल रहे हैं। लेकिन हर पल जिंदगी और सपनों के बीच का फासला भी बढ़ता जा रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-1940807250845131750?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/1940807250845131750/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/1940807250845131750'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/1940807250845131750'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='असलियत से हारती उम्मीदें...'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-4675362843760926081</id><published>2009-05-25T06:49:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T06:51:08.325-07:00</updated><title type='text'>मुंबई की बात निराली...:- 3</title><content type='html'>तीन दिनों के बाद आज फिर अपना एक अनुभव लिखने बैठा हूं, जो ढाई सालों से मैं लोकल में देखा रहा हूं। हार्बर लाइन की उस ट्रेन में वह लड़की रोज मुझे मिलती है। मैले-कुचैले कपड़े, बाल एक-दूसरे में उलझे हुए, आवाज से लेकर आखों में दीनता की झलक, जैसा कि  एक भीख मांगने वाले में होना चाहिए, वह सब कुछ उसमें देखने को मिलता है। इस रूट से अब मेरा आना-जाना कम ही होता है, लेकिन जब कभी भी हार्बर लाइन की ट्रेन से सीएसटी आता हूं, वह लड़की अक्सर मिल जाती है। ढाई साल में मुंबई काफी कुछ बदल गया है। मैं जहां रहता हूं, वहां आसपास के मैदानों में इमारतें खड़ी हो गई हैं, लेकिन वह लड़की अब भी नहीं बदली। शायद, उसकी उम्र भी वहीं थमी हुई है, ठीक उसकी जिंदगी की ही तरह। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने पहली बार उसे भीख मांगते हुए देखा, जो मेरे मन में भी दयाभाव पैदा हो गया, जो कभी नहीं होता। मैं कभी किसी भिखारी को रुपए-पैसे नहीं देता हूं। हां, कुछ खिला जरूर देता हूं, वह भी उनको जो वास्तव में लाचार हैं। मैं उस लड़की के बारे में बता रहा था। वह हाथ में एक फाइल लिए डिब्बे में भीख मांग रही थी, 'बाबू जी, रुपया-दो रुपया दे दो। गरीब बहन की दुआ लगेगी। मेरी मां बीमार है।' उसकी फाइल में कुछ पर्चे होते हैं, जिन पर से अब दवाइयों और डॉक्टर का नाम मिट चुका है। कोई उन पर गौर करता है, तो कोई बिना गौर किए ही पैसे दे देता है। उसकी आवाज में इतनी लाचारी होती है कि एक डिब्बे से दस-बीस रुपए मिल ही जाते हैं। उस दिन मैंने भी उसे पैसे दे दिए।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अगले दिन वह फिर उसी तरह की याचना करते हुए मिल गई। मैंने पैसे नहीं दिए, लेकिन उसके पीछे ही अगले स्टेशन पर उतर गया। देखा, ट्रेन से नीचे उतर कर वह चिल्लर गिन रही है, तभी एक जवान सा लड़का उसके पास आया और उससे पैसे लेकर गिनने लगा। पता नहीं वह लड़की का भाई था या फिर भिखारियों का बॉस, लेकिन पैसे देने के बाद लड़की का चेहरा मुरझाया हुआ था। अगली ट्रेन आई और वह अपनी फाइल संभाले उस में चढ़ गई। मैं अपने ऑफिस आ गया। लेकिन ऑफिस आने के बाद दिनभर सोचता रहा, क्या वह अपने लिए भीख मांगती है? क्या उसकी कमाई का रोज यही हाल होता है? क्या उसकी जिंदगी इसी तरह ट्रेन के डिब्बों में लोगों के सामने गिड़गिड़ाते हुए निकल जाएगी? और आखिरी सवाल, जो मेरे जेहन में कौंदता है, वह यह कि क्या उसकी मां कभी ठीक हो पाएगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(लिखते-लिखते काफी भावुक हो गया हूं, सो इस बार इतना ही। लेकिन जल्द ही अपने अगले ब्लॉग के साथ आऊंगा, लोकल के एक और अनुभव के साथ। यह अनुभव भी भिखारियों पर ही होगा। पढ़ते रहिए।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-4675362843760926081?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/4675362843760926081/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/3.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/4675362843760926081'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/4675362843760926081'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/3.html' title='मुंबई की बात निराली...:- 3'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-8958981516914584559</id><published>2009-05-22T04:31:00.000-07:00</published><updated>2009-05-22T05:18:36.849-07:00</updated><title type='text'>मुंबई की बात निराली... :- 2</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShaXerQzKVI/AAAAAAAAABs/5MnliZLBFpk/s1600-h/new_local_train.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5338620961559357778" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 221px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShaXerQzKVI/AAAAAAAAABs/5MnliZLBFpk/s320/new_local_train.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;मैं फिर हाजिर हूं, मुंबई लोकल के नए अनुभव के साथ। मुंबई का एक सिरा दूसरे सिरे से इतना दूर है कि दो से तीन घंटे लोकल में ही बीत जाते हैं। जब मैं अपने गांव में जाकर लोगों को बताता हूं कि मेरा ऑफिस मेरे घर से 40 किलोमीटर दूर है, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य होता है। वे सोचते हैं कि मेरी एक तिहाई उम्र तो लोकल में ही बीती जा रही है और यह सच भी है। हाल में मेरी माताजी मुंबई होकर गई हैं। उन्हें एक दिन गेटवे ऑफ इंडिया घुमाने ले गया। एक घंटा बीतने के बाद मां ने पूछा कि अभी और कितनी देर सफर करना पड़ेगा। जाहिर है, वे बोर हो गई थीं। मेरे यहां एक गांव से दूसरे गांव की दूरी इतनी नहीं होती, जितनी दूरी तक हमें रोटी के लिए काम करने जाना पड़ता है। खैर, उस दिन के बाद वे फिर कहीं घूमने नहीं गईं। उन्होंने घर में बैठकर टीवी देखना ही ठीक समझा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;अब मैं उस बात पर आता हूं, जिसके लिए इतनी बड़ी भूमिका बनाई है। दरअसल, लोकल में हर कोई बोर नहीं होता है, कुछ लोगों ने इससे अपने सफर सुहाना बनाने के रास्ते खोज रखे हैं। बहुतों की वजह से तो दूसरे लोगों का भी टाइमपास हो जाता है। अगर आप ग्रुप के साथ सफर कर रहे हैं, तो आप कभी बोर नहीं हो सकते। हां, इसके लिए जरूरी है कि आपको ताश खेलना आना चाहिए। आप लोग कुछ भी गलत सोचें, इससे पहले यह बता देता हूं कि यहां पैसों वाली बाजी नहीं लगती है, यह ताश का खेल सिर्फ मनोरंजन के लिए होता है। अगर आप रोज एक ही लोकल और एक ही डिब्बे में सफर करते हैं, तो ग्रुप मिलना भी मुश्किल नहीं है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;शेयर मार्केट में काम करने वाले ज्यादातर लोग अपने सफर में इसी तरह टाइमपास करते हैं। इसके अलावा बहुत से लोगों का टाइमपास अखबार या किताबें होती हैं। इससे टाइमपास भी हो जाता है और देश-दुनिया की जानकारी भी। किताबें पढ़कर लोग अपना साहित्यिक ज्ञान भी बढ़ा लेते हैं। अब इतने बड़े सफर को आसान करने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;इतने दिनों के सफर के बाद एक दिन मुझे बहुत टाइमपास का बहुत ही मजेदार और अच्छा तरीका देखने को मिला। एक दिन मैं घर जा रहा था। दादर स्टेशन तक पहुंचा कि अचानक लोकल का डिब्बा तबला बन गया। एक सज्जन, जो उम्र में काफी बड़े थे, वे रफी साहब के बहुत बड़े फैन थे। लोकल के डिब्बे को बजाते हुए, उन्होंने रफी साहब के सदाबहार नगमे गाने शुरू कर दिए। मैं तो मीरा रोड उतर गया, उनका गाने का सिलसिला कब तक चला पता नहीं। लेकिन उनके गाने से न सिर्फ उन्हें सुकून मिला, बल्कि बाकी लोगों का भी समय कट गया। उनकी आवाज भी बहुत अच्छी थी। तो, लोकल में कभी- कभी ऐसे लोग भी मिल जाया करते हैं। वैसे, मेरा समय तो ज्यादातर किताबों और एफएम के बीच ही कटता है, लेकिन समय काटने के लिए हर किसी को कुछ न कुछ करना पड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;(खुशी है कि आप लोग मेरे ब्लॉग और लोकल से जुड़े किस्सों को पसंद कर रहे हैं। आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इंतजार रहेगा। लोकल के अगले किस्से के साथ मैं एक बार फिर आपके सामने उपस्थित रहूंगा। बहुत- बहुत शुक्रिया।)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-8958981516914584559?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/8958981516914584559/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/2.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/8958981516914584559'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/8958981516914584559'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/2.html' title='मुंबई की बात निराली... :- 2'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShaXerQzKVI/AAAAAAAAABs/5MnliZLBFpk/s72-c/new_local_train.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-2733857356798706961</id><published>2009-05-20T09:17:00.000-07:00</published><updated>2009-05-20T09:21:27.921-07:00</updated><title type='text'>मुंबई की बात निराली... :- 1</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShQt8rctGKI/AAAAAAAAABc/pHHA5e_nTvA/s1600-h/local.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5337941978819401890" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 230px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShQt8rctGKI/AAAAAAAAABc/pHHA5e_nTvA/s320/local.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जिस शहर में लोगों को एक ही बिल्डिंग में रहने वाले की भी खबर नहीं होती, उसी शहर में लोकल टे्रन कई लोगों को जोडऩे का काम करती है। लोकल टे्रन न सिर्फ मुंबई की लाइफ लाइन है, बल्कि यह सफर करने वालों को भी जोड़ती है। मुंबई की आपाधापी के बीच लोकल टे्रन ही राहगीरों को एक- दूसरे के करीब लाती है। टे्रन सफर करते ही रोज नई कहानी देखने को मिल जाती है, लेकिन एक कहानी है, जो कभी नहीं बदलती। सुबह-शाम ईश्वर वंदना करने वालों की वह धुनें, जो कुछ साजों पर टे्रन में गूंजती हैं, कभी नहीं बंद होतीं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मैं रोज लोकल में सफर करता हूं। चर्चगेट से मीरा रोड तक। सुबह का भक्ति रस तो मुझे सुनने को नहीं मिलता है, लेकिन शाम के वक्त कभी- कभी यह सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। वह भी सिर्फ उस दिन जब ऑफिस से जल्दी खाली हो जाता हूं। भगवान के नाम पर जहां देश में राजनीति की जाती है, वहीं मुंबई की लोकल ट्रेन में लोग नि:स्वार्थ भाव से भक्ति करते हैं। उन्हें किसी राजनीति और लाभ से कोई मतलब नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भक्ति की यह यात्रा शुरू होती है, मरीन लाइन्स स्टेशन से (चर्चगेट का अगला स्टेशन)। संगीतमय रामधुन छेडऩे वाले ज्यादातर लोग गुजराती और मारवाड़ी होते हैं। वैसे, यहां क्षेत्रवाद नहीं है, हर कोई इस रामधुन में शामिल हो सकता है। कुछ लोग चर्चगेट बैठते हैं, तो कुछ लोग मरीन लाइन्स से। जब गु्रप के सभी लोग इकट्टे हो जाते हैं, तो राम नाम की जय- जयकार के साथ शुरू हो जाते हैं भजन। आपको शायद मजाक लगे, लेकिन वाद्य यंत्रों में सिर्फ मंजीरा होते हैं, इसके अलावा ढोलक का काम ट्रेन के डिब्बे कर देते हैं। सभी को राम स्तुति की पुस्तकें दी जाती हैं। यह हाल मेरा आंखों देखा है कि हिंदु समुदाय के लोगों के अलावा इस रामधुन में मुस्लिम बंधु भी शामिल होते हैं। इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि लोकल ट्रेन संप्रदायों को भी जोड़ती है। यह सिलसिला भाईंदर स्टेशन तक यह सिलसिला चलता है। उसके बाद प्रसाद वितरण होता है, जो रोज सफर करने वालों में से कोई एक ले आता है।जब सभी का गंतव्य आ जाता है, जो अपने रास्ते हो जाते हैं। फिर वही कहूंगा कि भले घर पहुंचकर वे लोग अपने पड़ोसियों की खबर न रखते हों, लेकिन लोकल ट्रेन में अपरिचित भी थोड़ी देर के लिए परिचित बन जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;(मुंबई की लोकल के किस्से बहुत हैं। अगली बार एक और किस्से के साथ हाजिर होऊंगा।)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-2733857356798706961?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/2733857356798706961/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/1.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/2733857356798706961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/2733857356798706961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/1.html' title='मुंबई की बात निराली... :- 1'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShQt8rctGKI/AAAAAAAAABc/pHHA5e_nTvA/s72-c/local.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7790855926431742172.post-5637912144432675943</id><published>2009-05-19T07:32:00.000-07:00</published><updated>2009-05-19T08:23:11.963-07:00</updated><title type='text'>मुंबई की बात निराली...</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;अपने तरह का एक अकेला शहर है ये,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;सोता नहीं है, ऊंघता आठों पहर है ये।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;इस पेड़ की छाया में बसे हैं कई लोग,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;जो चाहे रह जाए सबका घर है ये।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;किस्मत आजमाने आते हैं यहां सब,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;किसी की मंजिल, किसी की रहगुजर है ये।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;इस शहर को अपनाना बहुत मुश्किल है,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;रुकता है वही, जिसे अपनाता गर है ये।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShLOm6AgpBI/AAAAAAAAABU/RA8TfQimDSA/s1600-h/tata+best1.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5337555676189205522" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 214px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShLOm6AgpBI/AAAAAAAAABU/RA8TfQimDSA/s320/tata+best1.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:courier new;"&gt;(दोस्तो, यह गजल मैंने मुंबई शहर पर लिखी है, जो सबकी तकदीर लिखता है। मैं जल्द ही मुंबई पर एक सीरीज शुरू करने जा रहा हूं। इसमें मुंबई के उन पहलुओं का जिक्र करूंगा, जो मैंने देखे और महसूस किए। धन्यवाद...)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-5637912144432675943?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/5637912144432675943/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/5637912144432675943'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/5637912144432675943'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='मुंबई की बात निराली...'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_1vIRgkiMc18/ShLOm6AgpBI/AAAAAAAAABU/RA8TfQimDSA/s72-c/tata+best1.JPG' height='72' 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लग रहे हैं। क्या यह पैसा देश हित में लगने वाला है? जबकि देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है। बिलकुल नहीं। मुंबई की एक बड़ी आबादी कल भी झोपड़े में रहती थी और कल भी रहेगी। विदेशी फिल्मकार यहां आकर अगर 'स्लमडॉग' जैसी फिल्में बनाते हैं, तो देशी कलाकार और फिल्मकार उनकी आलोचना करते हैं। देश और देशवासियों से इतना ही प्रेम है, तो क्यों नहीं आईपीएल की कमाई का कुछ हिस्सा चॉल में रहने वाले लोगों पर खर्च करते? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर, चुनाव की तैयारी चल रही है और हमारे कलाकार विदेश में हैं। क्या उनके बाहर रहने से उतने वोट कम नहीं होंगे? क्या वे वोट करने भारत आएंगे? आखिर यह क्या है? जब देश पर कोई संकट आता है, तो यही कलाकार पब्लिसिटी के लिए कैमरे के सामने खड़े होकर सरकार पर दोष मढ़ते हैं। अगर आप वोट नहीं कर रहे हैं, तो सरकार को गाली देने का भी कोई अधिकार नहीं रखते। मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि सरकार ने आईपीएल को सुरक्षा देने से मना कर दिया। आईपीएल किसी भी कीमत पर चुनावों की सुरक्षा से बड़ा नहीं हो सकता। कुल मिलाकर मेरी नजर में आईपीएल इस वक्त उठाया गया सबसे गलत कदम है। फिर अपने दोस्त की बात पर वापस जाता हूं। मैं यही कहूंगा कि आईपीएल से अच्छा है कि नए खिलाडिय़ों को बारी- बारी से सीरीज में खिलाया जाए। इससे नई प्रतिभाएं भी सामने आएंगी और देश का कुछ हित भी होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7790855926431742172-1942570909775757306?l=manodasha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://manodasha.blogspot.com/feeds/1942570909775757306/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/1942570909775757306'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7790855926431742172/posts/default/1942570909775757306'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://manodasha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='आईपीएल बोले तो- इंडियन परेशानी लीग'/><author><name>रवि रावत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13716520903353231173</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
